पश्चिम चंपारण: 53 साल बाद भी छत नसीब नहीं, खुले आसमान के नीचे भविष्य संवारने को मजबूर नौनिहाल
शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था के दावों की पोल खोलती है। बेतिया अनुमंडल के चनपटिया प्रखंड स्थित चौधुर टोला के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य आज भी खुले आसमान के नीचे सिमटा हुआ है। यह विद्यालय न केवल बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है, बल्कि यहां पढ़ने वाले मासूमों के लिए एक सुरक्षित छत तक मयस्सर नहीं है।
1971 से जारी है संघर्ष
इस विद्यालय की स्थापना वर्ष 1971 में हुई थी। पांच दशक से अधिक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है। इतने वर्षों में न जाने कितनी सरकारें आईं और गईं, लेकिन चौधुर टोला के इस स्कूल की बदहाली जस की तस बनी हुई है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे धूप, बारिश और ठंड के मौसम में भी खुले में बैठने को मजबूर हैं, जिससे उनकी पढ़ाई तो बाधित होती ही है, साथ ही उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है।
सुविधाओं का घोर अभाव
एक सरकारी विद्यालय से जो न्यूनतम अपेक्षाएं होती हैं, यह स्कूल उन पर भी खरा नहीं उतरता है। जब बच्चों के बैठने के लिए पक्की छत और चारदीवारी ही नहीं होगी, तो वे एकाग्र होकर पढ़ाई कैसे करेंगे? स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि कई बार इस समस्या को लेकर संबंधित अधिकारियों को अवगत कराया गया, लेकिन आश्वासन के सिवाय उन्हें कुछ नहीं मिला।
क्या है भविष्य की राह?
शिक्षा के अधिकार की बात करने वाले तंत्र के सामने यह एक बड़ा सवाल है। क्या एक प्राथमिक विद्यालय के लिए भवन निर्माण करना इतना कठिन है कि पांच दशक बाद भी बच्चे खुले में पढ़ने को मजबूर हैं? यह स्थिति न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है, बल्कि उन बच्चों के अधिकारों का भी हनन है जो इस उम्मीद में स्कूल आते हैं कि वे शिक्षित होकर अपना भविष्य बेहतर बना सकेंगे। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस ओर ध्यान देता है या फिर इन बच्चों का भविष्य इसी तरह खुले आसमान के नीचे ही बीतता रहेगा।
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