मुजफ्फरपुर के प्रत्यूष की मिसाल: 10 साल से व्हीलचेयर पर, बिना कोचिंग बने SDM
अदम्य साहस की कहानी: मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को मात देकर प्रत्यूष बने प्रशासनिक अधिकारी
मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा निवासी प्रत्यूष प्रभाकर ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जो न केवल उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। पिछले एक दशक से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे प्रत्यूष ने व्हीलचेयर पर रहते हुए 70वीं बीपीएससी परीक्षा में सफलता का परचम लहराया है। उन्हें बिहार प्रशासनिक सेवा (BAS) में जगह मिली है और ओएच कैटेगरी में उन्होंने दूसरा स्थान प्राप्त किया है।
घर को बनाया गुरुकुल, नहीं ली किसी कोचिंग की मदद
प्रत्यूष की सफलता की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने इसके लिए किसी भी कोचिंग संस्थान या महंगे ऑनलाइन कोर्स का सहारा नहीं लिया। शारीरिक चुनौतियों के कारण बाहर जाकर पढ़ाई करना उनके लिए संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने घर को ही अपना क्लासरूम बना लिया। उन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए यूट्यूब और अन्य डिजिटल संसाधनों का उपयोग किया। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि बेहद मजबूत रही है; उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की और एलएस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक व स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने पीएचडी पूरी की और पांच विषयों में जेआरएफ के लिए चयनित हुए।
परिवार का अटूट साथ और संघर्ष का सफर
प्रत्यूष अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता को देते हैं। उनकी मां नीलम कुमारी एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, जिससे उन्हें घर में हमेशा एक सकारात्मक शैक्षणिक माहौल मिला। हालांकि, वे अपने पिता के योगदान को विशेष रूप से याद करते हैं, जिन्होंने बचपन से लेकर अब तक हर कदम पर उनका साथ दिया। चाहे उन्हें स्कूल ले जाना हो या दैनिक जीवन की अन्य जरूरतें, उनके पिता हमेशा एक ढाल बनकर खड़े रहे।
प्रशासनिक सेवा में जाने का उद्देश्य
प्रत्यूष का मानना है कि एक दिव्यांग व्यक्ति के रूप में उन्होंने समाज की उन चुनौतियों को बहुत करीब से महसूस किया है, जिनका सामना आम लोग करते हैं। यही अनुभव उन्हें प्रशासनिक सेवा में जाकर व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता रहा। इंटरव्यू के दौरान भी उनसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन और जमीनी स्तर पर काम करने की उनकी क्षमता को लेकर सवाल पूछे गए, जिनका उन्होंने बखूबी जवाब दिया। प्रत्यूष की यह सफलता साबित करती है कि यदि हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक सीमाएं कभी भी सपनों के आड़े नहीं आतीं।
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