मुजफ्फरपुर: डूबने से हुई मौतों पर मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहे पीड़ित परिवार, फाइलों में उलझा प्रशासन
मुजफ्फरपुर में प्रशासनिक सुस्ती का दंश झेल रहे पीड़ित
मुजफ्फरपुर में नदियों और तालाबों में डूबने से होने वाली मौतों के बाद पीड़ित परिवारों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अपनों को खोने का गम तो है ही, लेकिन अब सरकारी मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काटना इन परिवारों के लिए एक नई त्रासदी बन गया है। इस साल अब तक दो दर्जन से अधिक बच्चे और किशोर पानी में डूबने के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं, जिनमें से आठ परिवार आज भी सरकारी मदद की बाट जोह रहे हैं।
फाइलों की धीमी रफ्तार और तारीख पर तारीख
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, मरने वालों में ज्यादातर 7 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे हैं, जो गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। इन परिवारों के लिए चार लाख रुपये की मुआवजा राशि एक बड़ी आर्थिक राहत हो सकती है, लेकिन अंचल कार्यालयों की कार्यशैली ने इस प्रक्रिया को बेहद जटिल बना दिया है।
पीड़ित परिवारों के अनुभव बेहद निराशाजनक हैं:
- अखिलेश कुमार (तुर्की): 27 अप्रैल को बूढ़ी गंडक में डूबने से जान गंवाने वाले नौ वर्षीय अखिलेश के पिता सुरेश पंडित का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने में ही 15-20 दिन लग गए। जून में प्रशासन ने स्वीकृति दी, लेकिन अब तक राशि उनके खाते में नहीं पहुंची है।
- राजेश कुमार (औराई): बागमती की उपधारा में डूबने वाले 12 वर्षीय राजेश के पिता राज किशोर साह का कहना है कि उन्हें हर बार ‘अगले हफ्ते’ का आश्वासन दिया जाता है। महीनों बीत जाने के बाद अब जाकर प्रस्ताव मुख्यालय पहुंचा है।
- मो. अमजद (साहेबगंज): सात वर्षीय अमजद के पिता मो. तारिक ने बताया कि कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद उन्हें एक रुपया नहीं मिला। वरीय अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद अब उम्मीद जगी है कि शायद इस महीने आवंटन मिल जाए।
प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल
सीओ कार्यालय से रिपोर्ट भेजने में हो रही देरी ने मुआवजे की पूरी प्रक्रिया को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां पीड़ित परिवार अपने जख्मों पर मरहम के लिए सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर हो रही देरी उनके सब्र का इम्तिहान ले रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते कागजी कार्रवाई पूरी हो जाए, तो इन परिवारों को दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ेंगी।
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