मुजफ्फरपुर: 78 निजी स्कूलों की मान्यता अटकी, शिक्षा विभाग की सुस्ती पर उठे सवाल
मुजफ्फरपुर जिले में 78 निजी स्कूलों की मान्यता का मामला अधर में लटका हुआ है, जिससे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इन स्कूलों ने शिक्षा विभाग के ‘ई-संबद्धन’ पोर्टल पर मान्यता के लिए आवेदन किया था, लेकिन अधिकारियों की कथित सुस्ती के कारण उन्हें अभी तक पंजीकरण नहीं मिल पाया है। इस देरी पर राज्य स्तर से भी नाराजगी व्यक्त की गई है और अधिकारियों से जवाब तलब किया गया है।
शिक्षा विभाग द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार, मान्यता आवेदनों की जांच पहले प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) को करनी होती है। बीईओ के सत्यापन के बाद, जिला स्तर के अधिकारियों को इसकी जांच कर अनुमोदन देना होता है। यदि कोई स्कूल मान्यता के मानकों पर खरा नहीं उतरता है, तो उसका कारण भी स्पष्ट रूप से बताना अनिवार्य है।
वर्तमान स्थिति यह है कि 58 स्कूलों के आवेदन अभी भी प्रखंड स्तर पर बीईओ के पास लंबित हैं, जबकि 20 स्कूलों की फाइलें जिला स्तर पर अटकी हुई हैं। इस लेटलतीफी के कारण सैकड़ों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता में है और इन स्कूलों को यू-डाइस कोड भी नहीं मिल पा रहा है। यू-डाइस कोड शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए एक अनिवार्य पहचान संख्या है।
जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) ने सभी बीईओ को इस मामले को निपटाने के लिए एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने जोर दिया कि अधिकारियों को भौतिक सत्यापन के लिए मौके पर जाना होगा और फोटो सहित अन्य आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। राज्य स्तर पर भी इस मामले की लगातार समीक्षा की जा रही है, और अधिकारियों की निष्क्रियता पर कड़ी फटकार लगाई गई है।
जिले में लगभग 900 स्कूलों को पहले ही यू-डाइस कोड मिल चुका है, लेकिन 500 से अधिक स्कूल अभी भी बिना इस कोड के संचालित हो रहे हैं। यह स्थिति शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है। शिक्षा विभाग को इस मामले में तत्काल कार्रवाई करनी होगी ताकि निजी स्कूलों को समय पर मान्यता मिल सके और शिक्षा के अधिकार का सही ढंग से पालन हो सके।
मान्यता प्रक्रिया में देरी: एक गंभीर चुनौती
निजी स्कूलों की मान्यता प्रक्रिया में यह देरी न केवल स्कूलों के संचालन को प्रभावित करती है, बल्कि छात्रों के भविष्य पर भी नकारात्मक असर डालती है। बिना मान्यता के संचालित होने वाले स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी देरी न हो और सभी आवेदन समयबद्ध तरीके से निपटाए जाएं।
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