मुजफ्फरपुर में 451 एकड़ जमीन का विवाद: बियाडा की सक्रियता से बस्तियों में हड़कंप
मुशहरी में 1986 के अधिग्रहण पर फिर छिड़ी जंग
मुजफ्फरपुर के औद्योगिक विस्तार के लिए दशकों पहले अधिग्रहित की गई 451 एकड़ जमीन अब एक बड़े विवाद का केंद्र बन गई है। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) ने मुशहरी अंचल के विभिन्न मौजों में स्थित इस भूमि की दोबारा खोजबीन शुरू कर दी है। इस कदम ने उन सैकड़ों परिवारों की नींद उड़ा दी है, जिन्होंने पिछले कई वर्षों से इस जमीन पर अपने आशियाने बना लिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 1986 में औद्योगिक क्षेत्र के विस्तार के लिए सरकार ने मुशहरी क्षेत्र में 451 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। हालांकि, उस समय न तो इसका दाखिल-खारिज हो पाया और न ही बियाडा ने इस जमीन पर अपना भौतिक कब्जा लिया। नतीजतन, कागजों पर सरकारी रही यह जमीन धीरे-धीरे निजी हाथों में बिकती रही और आज वहां पक्के मकान और घनी बस्तियां बस चुकी हैं।
दस्तावेजों की तलाश और प्रशासन की चुनौती
बियाडा ने अब इस पूरी जमीन को अपनी ‘रोक सूची’ (स्टॉप लिस्ट) में डाल दिया है, जिससे वहां रहने वाले लोगों में हड़कंप मच गया है। जिला भू-अर्जन कार्यालय और बियाडा के बीच दस्तावेजों के मिलान का काम चल रहा है। भू-अर्जन पदाधिकारी के अनुसार, उस समय की अधिग्रहण प्रक्रिया रतवारा गंडक कॉलोनी स्थित कार्यालय से संचालित हुई थी। कार्यालय के स्थानांतरण के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो क्षतिग्रस्त हो गए हैं या खो गए हैं, जिससे स्थिति स्पष्ट करने में कठिनाई आ रही है।
रैयतों का पक्ष और कानूनी लड़ाई की तैयारी
जमीन पर बसे लोगों का तर्क है कि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बावजूद उन्हें कभी व्यक्तिगत नोटिस नहीं मिला और न ही उन्हें मुआवजे का भुगतान किया गया। वे पिछले तीन दशकों से वहां रह रहे हैं और अब इस अधिग्रहण की वैधानिकता को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।
फिलहाल, प्रशासन और बियाडा के बीच चल रहा दस्तावेजों का सत्यापन ही यह तय करेगा कि इन बस्तियों का भविष्य क्या होगा। स्थानीय निवासियों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार पुराने रिकॉर्ड के आधार पर अपना दावा मजबूत कर पाएगी या फिर दशकों से बसे लोगों को राहत मिलेगी।
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