बीआरएबीयू में पीएचडी दाखिले का संकट: 813 सीटें खाली, नेट-जेआरएफ की अनिवार्यता से बढ़ी चुनौती
पीएचडी दाखिले पर गहराया संकट
मुजफ्फरपुर स्थित बीआरए बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) में पीएचडी नामांकन की प्रक्रिया इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय में वर्तमान में पीएचडी की 813 सीटें रिक्त पड़ी हैं, जिन्हें भरने को लेकर अब संशय के बादल मंडराने लगे हैं। राज्य सरकार के नए आदेश के बाद अब केवल नेट (NET) और जेआरएफ (JRF) उत्तीर्ण छात्र ही पीएचडी में दाखिला ले सकेंगे, जिससे सीटों के खाली रहने की आशंका प्रबल हो गई है।
सीटों और छात्रों की संख्या में बड़ा अंतर
विश्वविद्यालय के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2023-24 के पीएचडी परिणाम में मात्र 78 छात्र ही सफल हो पाए थे। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा संशोधित परिणाम जारी किए जाने की तैयारी है, जिससे उत्तीर्ण छात्रों की संख्या में कुछ वृद्धि हो सकती है। बावजूद इसके, शिक्षकों का मानना है कि यह संख्या रिक्त सीटों के मुकाबले बहुत कम है। जानकारों के अनुसार, बीआरएबीयू से हर साल औसतन 100 से 150 छात्र ही नेट और जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते हैं। ऐसे में यदि केवल इन्हीं छात्रों को दाखिला मिलता है, तो हर साल पीएचडी की सैकड़ों सीटें खाली रह जाना तय है।
छात्रों की समस्याएं और संसाधनों का अभाव
दूसरी ओर, शोध के इच्छुक छात्रों ने विश्वविद्यालय में संसाधनों की कमी पर चिंता जताई है। छात्रों का कहना है कि कैंपस में नेट और जेआरएफ की तैयारी के लिए आवश्यक पुस्तकों का घोर अभाव है, जिसके कारण उन्हें निजी स्तर पर बाहर से किताबें मंगवानी पड़ती हैं। इसके अलावा, हाल ही में हिंदी विभाग में चल रही नेट कोचिंग को बंद कर दिए जाने से भी छात्रों में नाराजगी है। इस कोचिंग के माध्यम से बड़ी संख्या में छात्र लाभान्वित हो रहे थे।
भविष्य पर अनिश्चितता
छात्रों के बीच सबसे बड़ा डर पैट (PAT) परीक्षा को लेकर है। वर्ष 2025 के लिए अभी तक पैट आयोजित करने की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है, जिससे उन छात्रों का भविष्य अधर में लटका है जो इस परीक्षा के माध्यम से पीएचडी में प्रवेश की उम्मीद लगाए बैठे थे। विश्वविद्यालय प्रशासन को अब इन चुनौतियों का समाधान ढूंढना होगा ताकि शोध की गुणवत्ता और सीटों के उपयोग के बीच संतुलन बनाया जा सके।
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