मुजफ्फरपुर के विजन सेंटरों पर हर महीने सवा करोड़ का खर्च, फिर भी मरीजों की आंखों में अंधेरा
सरकारी खजाने से मोटी रकम, पर जांच के नाम पर खानापूर्ति
मुजफ्फरपुर समेत पूरे बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के नाम पर खोले गए विजन सेंटर फिलहाल सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की ताजा समीक्षा रिपोर्ट ने इन केंद्रों की पोल खोल दी है। पीपीपी मोड पर संचालित इन केंद्रों पर सरकार हर महीने करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मरीजों की आंखों की जांच का आंकड़ा बेहद निराशाजनक है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य के 200 प्रखंडों में विजन सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों का मुख्य उद्देश्य आम लोगों की आंखों की जांच करना और उन्हें चश्मा उपलब्ध कराना है। इसके लिए सरकार प्रति सेंटर 64 हजार रुपये का मासिक भुगतान निजी एजेंसी को करती है। इस तरह पूरे बिहार में इन केंद्रों पर हर महीने 1.28 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च किया जा रहा है। बावजूद इसके, अप्रैल और मई की रिपोर्ट बताती है कि पूरे प्रदेश में महज छह फीसदी मरीजों की ही जांच हो पाई है।
मुजफ्फरपुर की स्थिति चिंताजनक
जिले के मड़वन, कटरा और बंदरा पीएचसी में चल रहे विजन सेंटरों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इन तीन केंद्रों पर मई महीने में 12,609 लोगों की जांच का लक्ष्य था, लेकिन केवल 588 लोगों की ही जांच हो सकी। अप्रैल का हाल भी कुछ ऐसा ही था, जहां 11,944 के लक्ष्य के मुकाबले महज 562 लोगों को जांच नसीब हुई। कुल मिलाकर, इन केंद्रों पर जांच का प्रतिशत पांच फीसदी से भी कम रहा है।
चश्मों का वितरण भी ठप
केवल जांच ही नहीं, बल्कि चश्मा वितरण के मामले में भी मुजफ्फरपुर ‘रेड जोन’ में शामिल है। दो महीनों में एक सेंटर से औसतन केवल 69 चश्मे ही बांटे गए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने इस सुस्ती पर नाराजगी जताई है। इसके अलावा, सदर अस्पताल में मोतियाबिंद के ऑपरेशन की स्थिति भी बदतर है, जहां इस वित्तीय वर्ष में अब तक केवल 9 ऑपरेशन ही हो पाए हैं।
सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने सभी केंद्रों को जांच की गति बढ़ाने के सख्त निर्देश दिए हैं। हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आम जनता को स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल रहा, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
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