मुजफ्फरपुर: सरकारी मुआवजे के नाम पर दलालों की चांदी, अपनों को खोने वाले परिवारों की मजबूरी का उठा रहे फायदा
मुजफ्फरपुर में सड़क हादसों, डूबने या सर्पदंश जैसी प्राकृतिक आपदाओं में अपनों को खोने वाले परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूटता है। लेकिन, इस कठिन समय में उन्हें सरकारी मदद मिलने के बजाय बिचौलियों के जाल में फंसना पड़ रहा है। मुआवजा राशि दिलाने के नाम पर सक्रिय दलाल और कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवारों की बेबसी का फायदा उठाकर उनसे अवैध वसूली कर रहे हैं।
प्रक्रिया की जटिलता और बिचौलियों का खेल
सरकारी नियमों के तहत किसी भी दुर्घटना में मौत होने पर आश्रितों को मुआवजा देने का प्रावधान है। हालांकि, सीओ कार्यालय से लेकर जिला स्तर तक फाइलें महीनों तक चक्कर काटती रहती हैं। इसी देरी का फायदा उठाकर दलाल सक्रिय हो जाते हैं। जो परिवार रिश्वत देने में सक्षम हैं, उनकी फाइलें जल्दी आगे बढ़ जाती हैं, जबकि गरीब और लाचार परिवार महीनों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
पीड़ितों की आपबीती
- रेपुरा, सरैया: भिखारी महतो की सर्पदंश से मौत के बाद उनकी पत्नी सुंदरी देवी पर तीन बच्चों की जिम्मेदारी है। मुआवजे के लिए उन्होंने महाजन से कर्ज लेकर दलालों को दो हजार रुपये दिए, लेकिन अब तक उन्हें एक रुपया भी नहीं मिला।
- फतेहाबाद, पारू: देवकी देवी की नदी में डूबने से मौत के बाद उनके पति अकलू राम ने मुआवजे की उम्मीद में एक व्यक्ति को तीन हजार रुपये दिए। वह व्यक्ति अब पैसे न होने का बहाना बना रहा है और अकलू राम पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया है।
- बखरा, सरैया: पथलू साह की मौत के बाद उनकी पत्नी पिंकी देवी विसरा रिपोर्ट के इंतजार में महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। दुकान बंद होने और घर पर बढ़ते कर्ज के कारण उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।
पारदर्शिता की दरकार
पीड़ित परिवारों का कहना है कि मुआवजा प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। बिचौलियों पर नकेल कसना बेहद जरूरी है ताकि ‘मरहम’ के इंतजार में बैठे परिवारों को समय पर न्याय मिल सके। जब तक प्रशासन इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठाता, तब तक मुआवजे की राशि जरूरतमंदों तक पहुंचने के बजाय दलालों की जेब में जाती रहेगी।
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