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शिक्षा सेवकों की नई भूमिका: अब बच्चों को स्कूल पहुंचाना और महिलाओं को साक्षर बनाना भी ज़िम्मेदारी

मुजफ्फरपुर: बिहार में शिक्षा सेवकों की भूमिका का विस्तार किया गया है। अब वे केवल असाक्षर महिलाओं को पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों को नियमित रूप से स्कूल पहुंचाने और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जन शिक्षा निदेशालय ने इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें शिक्षा सेवकों के कार्यों और दायित्वों को स्पष्ट किया गया है।

राज्य के सभी जिलों के डीईओ और डीपीओ साक्षरता को भेजे गए पत्र में जन शिक्षा के अपर सचिव सह निदेशक विजय कुमार ने शिक्षा सेवकों के लिए निर्धारित इन नए कार्यों के पूर्ण निष्पादन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। यह पहल महादलित, दलित, अल्पसंख्यक पिछड़ा वर्ग अक्षर आंचल योजना कार्यक्रम के तहत कार्यरत शिक्षा सेवकों और तालिमी मरकज के लिए है, जिसका उद्देश्य इन समुदायों में साक्षरता, शिक्षा और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना है।

बच्चों को स्कूल से जोड़ना और उपस्थिति बढ़ाना

शिक्षा सेवकों को अब अपने टोले के उन बच्चों की पहचान करनी होगी जो नियमित रूप से स्कूल नहीं आते हैं। उन्हें इन बच्चों को स्कूल तक ले जाने और शुरुआती दो घंटों तक स्कूल में रहकर उन्हें दी जा रही शिक्षा से जुड़ने में सहयोग करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अतिरिक्त, शिक्षा सेवकों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके टोले के बच्चों की स्कूल में कम से कम 75% उपस्थिति रहे। विद्यालय अवधि से पहले बच्चों के लिए कोचिंग और काउंसिलिंग की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया गया है, ताकि वे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

शिक्षक की अनुपस्थिति में कक्षा संचालन और अन्य सहयोग

इन नई जिम्मेदारियों में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यदि स्कूल में शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं, तो शिक्षा सेवकों को कक्षा एक और दो का संचालन करने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। इसके अलावा, उन्हें मध्याह्न भोजन (एमडीएम) योजना, गैर-शैक्षणिक गतिविधियों और बच्चों के स्वास्थ्य जांच जैसे कार्यक्रमों में भी सहयोग करने के लिए कहा गया है।

असाक्षर महिलाओं के लिए निरंतर प्रयास

अपनी प्राथमिक भूमिका के तहत, शिक्षा सेवक प्रतिदिन दोपहर में एक घंटे 15 से 45 वर्ष की असाक्षर महिलाओं को पढ़ाना जारी रखेंगे। इसके साथ ही, वे अपने टोले में संपर्क स्थापित कर समुदाय के लोगों को साक्षर और शिक्षित बनने के लिए प्रेरित करेंगे। शिक्षा सेवकों को एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हुए इन समुदायों में शिक्षा के प्रति जागरूकता और सामाजिक सुधार लाने का लक्ष्य दिया गया है। यह कदम बिहार में शिक्षा के स्तर को सुधारने और समाज के वंचित वर्गों तक शिक्षा की पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।


अस्वीकरण: यह समाचार उपलब्ध स्थानीय स्रोतों के आधार पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से तैयार किया गया है। AI से त्रुटियाँ संभव हैं और इस सामग्री की सटीकता या प्रामाणिकता की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। TheAinak केवल सूचनाओं का संकलन करता है और इसकी विषय-वस्तु के लिए उत्तरदायी नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी जानकारी पर भरोसा करने या उसके आधार पर कोई कार्रवाई करने से पहले उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि अवश्य कर लें।

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