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बिहारी पैसा से चमकई बा कोटा शहरिया , और हम बिहारी पलायन ला मजबूर!

किसने नाम नहीं सुना है कोटा शहर का। जी हां यह वही शहर है जो अब भारत में एजुकेशन सिटी के नाम से भी जाना जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 240 किलोमीटर दूर चंबल नदी के तट पर बसा हुआ यह खूबसूरत शहर पूरे भारत में मशहूर है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग दो लाख विद्यार्थी अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग करने यहां आते हैं। भारत के कठिन प्रवेश परीक्षाओं में माने जाने वाले आईआईटीजेईई (IIT)और नीट(NEET) और एम्स(AIMS) के तैयारी के लिए यह शहर खासतौर से मशहूर है।

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आइए पहले कोटा के बारे में कुछ तथ्यों को जानते हैं

  • कोटा शहर भारत में कोचिंग का केंद्र बन चुका है जहां भारत के अलग-अलग राज्यों से विद्यार्थी कोचिंग करने आते हैं।
  • विद्यार्थियों की ज्यादातर संख्या मैट्रिक और इंटर और उससे एक साल बाद वालों की होती है
  • कोटा के ज्यादातर विद्यार्थी वहां के नामी-गिरामी कोचिंग संस्थान में पढ़ते हैं जैसे कि Allen ,Resonance,Bansal classes
  • साल 2017 के एक अनुमान के हिसाब से लगभग दो लाख विद्यार्थी कोटा में पढ़ाई कर रहे थे
  • कोटा में लगभग 50% विद्यार्थियों की आबादी बिहार और उत्तर प्रदेश से है
  • हर साल लगभग 75 हज़ार नये विद्यार्थी कोटा में पढ़ाई करने आते हैं और लगभग उतने ही विद्यार्थी यहां से वापस चले जाते हैं
  • साल 2017 के अनुमान के हिसाब से कोटा शहर की वार्षिक कमाई लगभग पंद्रह सौ करोड़ रुपए थी

अब आइए बात करते हैं बिहार की और किस तरह से हम बिहारी लोग अपने पैसों से दूसरे शहरों को आबाद कर रहे हैं और अपने घरों को वीरान।

  • आसानी से समझने के लिए चलिए मान लेते हैं कि लगभग दो लाख बच्चे कोटा शहर में पढ़ रहे है, और उन बच्चों में से सिर्फ 30% बच्चे अपने बिहार राज्य से हैं। इसका मतलब यह हुआ कोटा में 1 साल में लगभग 60 हज़ार बिहारी बच्चे पढ़ रहे हैं।
  • अब यह तो सबको पता है कि कोटा में एक बच्चे के रहने का खर्च लगभग 8 से ₹10 हज़ार प्रतिमाह आता है, । इस हिसाब से एक बच्चे के 1 साल के रहने-खाने का खर्च लगभग ₹1लाख 20 हज़ार रुपए।
  • कोटा के किसी एक कोचिंग इंस्टीट्यूट का 1 साल का फीस लगभग डेढ़ से दो लाख रुपया आएगा
  • कोटा से बिहार आने जाने के लिए साल में अगर दो बार हिसाब लगाया जाए तो लगभग पांच से ₹10 हज़ार रुपया आएगा
  • कुल मिलाकर 1 साल में एक बच्चे पर लगभग ढाई लाख रुपए कोटा शहर में खर्च हो जाता है।
  • इस हिसाब से 60000 बिहारी बच्चों का l कुल खर्चा लगभग 15 अरब रुपए आएगा। यह ऐसा कहिए हर साल 15 अरब रुपए बिहार से कोटा शहर में समा जाता है।
  • 15 अरब कितनी बड़ी रकम है वह देखने के लिए 15 के आगे लगे शून्य देखिए , ₹15000000000

कोटा शहर से पहले से आबाद हमारे बिहार के कई शहर जैसे कि पटना ,मुजफ्फरपुर , पढ़ाई के लिए इस तरह का माहौल नहीं बना सके। कुछ लोग भले ही मेरे इस लेख को बुरा समझेंगे और पटना की विशेषताओं का गुणगान करना शुरू करेंगे लेकिन सच फिर भी यही है कि कोटा जैसा पढ़ाई का माहौल बिहार के किसी शहर में नहीं है।
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आखिर ऐसा क्यों है? जरा सोचिए जब ज्यादातर पढ़ने वाले भी बिहार से हैं और कोटा के ज्यादातर पढ़ाने वाले शिक्षक भी बिहार से हैं और तो और बहुत सारे दुकान वाले भी बिहार से ही जाकर वहां व्यापार कर रहे हैं। जब यह सारा काम हम बिहारी लोग पलायन करके दूसरे शहर में कर पाते हैं तो ऐसा क्या हुआ है कि हम अपने बिहार में ही कुछ ऐसा चमकता हुआ शहर नहीं कामयाब कर सके। इन सब बातों को तह तक समझने के लिए हमें अपनी कमियों को दूर करना होगा ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां बिहार से बाहर पलायन करने को मजबूर ना हो!

सबसे पहली बात आती है सुरक्षा की

  • बिहारी माता पिता अपने बच्चों को बिना किसी डर भय के कोटा शहर में अकेले छोड़ आते हैं और साथ में उन्हें यह उम्मीद रहती है कि वहां बच्चे सुरक्षित हैं
  • लेकिन वही बच्चे जब वापस घर आते हैं तो रेलवे स्टेशन से घर तक आने में भी रात को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाते। एक अलग ही भय का माहौल होता है।
  • मैंने अपने आसपास में कितने लोगों को देखा है कि वह अपने पुत्र पुत्रियों को , कोटा या बेंगलुरु जैसे शहरों में अकेले रहने के लिए छोड़ आते हैं और वहां सुरक्षा का इतना अच्छा इंतजाम है कि कुछ डर नहीं रहता है। लेकिन अपने यहां के शहरों का क्या माहौल है यह मुझे व्याख्या करने की जरूरत नहीं।

दूसरी सबसे बड़ी कमी जो हमारे राज्य को तरक्की से रोकती है वह है जात पात का भेदभाव और एक तरह से कहिए तो यह बिहार की सबसे बड़ी कमी है

  • कोटा शहर या फिर वैसे ही अनेक कामयाब शहर की खासियत यह भी है कि वहां जात पात और धर्म मजहब का भेदभाव ना के बराबर है। कोटा शहर में कमरा किराया देने से पहले कोई आपका जाति या मजहब नहीं पूछता, वहां पर सिर्फ मकान का मालिक आपको एक किराएदार की हैसियत से रखता है और उसकी बदौलत पैसे कमाता है
  • लेकिन अपने बिहार का माहौल कुछ अलग है यहां पर हर एक काम से पहले जाति और धर्म का भेदभाव बीच में आता है। पटना जैसे तरक्की वाले शहर में भी एक विद्यार्थी को कमरा किराया देने से पहले उसकी जाति और धर्म देखी जाती है।

तीसरी कमी हमारे राज्य की यह है कि हमारे यहां किसी भी त्योहार या पूजा या जुलूस को कुछ मनचले लोगों ने कब्जा कर लिया है।

  • आज के जमाने में अपने राज्य में कोई भी त्यौहार या जुलूस मनाया जाता है उसका सिर्फ एक मकसद होने लगा है जितना ज्यादा हो सके रोड पर हुड़दंग मचाओ और अराजकता फैलाओ
  • पूजा तो भगवान की की जाती थी लेकिन आज कुछ मनचलों ने पूजा स्थल को भी भोजपुरी अश्लील गानों से भर दिया है। ऐसा कोई भी जुलूस जो पूजा के नाम पर निकाला जाता है उसमें भगवान का जिक्र कहीं नहीं होता
  • जरा सोचिए आपका बच्चा कोटा शहर पढ़ने गया हो और वहां हर महीने कुछ इस तरह का जुलूस या त्यौहार मनाया जाए जिसमें अपने बिहार की तरह जोर जोर से डीजे पर भद्दे गाने बजाएं जाएं तो आपका बच्चा वहां पढ़ाई कर पाएगा? और अगर वहां ऐसा होने लगा तो क्या बिहार के माता पिता अपने बच्चों को कोटा शहर भेजना पसंद करेंगे?
  • अगर ऊपर के सवाल का जवाब आपको मालूम है, तो फिर आपको यह भी मालूम चल गया होगा कि हमारे शहरों में दूसरे राज्यों से बच्चे क्यों नहीं पढ़ने आते?

सब सोचते हुए मुझे खुद पर बीती हुई एक कहानी याद आ जाती है। साल 2009 में मैं कोटा शहर में तैयारी के लिए गया था। वहां पढ़ने का माहौल वाकई बहुत ही अच्छा है लेकिन साथ में ही वहां के रहने वालों ने इस तरह से कोशिश की है कि वहां रह रहे बच्चों को भी कोई तकलीफ ना हो।

जब मैं कोटा में तैयारी कर रहा था उस वक्त 1 दिन की बात है मैं पढ़ते-पढ़ते थक गया तो अपने कमरे से बाहर आया। बाहर में मेरे कमरे के मकान मालिक अपने पड़ोसी से कुछ बातचीत कर रहे थे, लेकिन जैसे ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी उन्होंने तुरंत कहा”बेटा आपको पढ़ने में डिस्टर्ब हो रहा है तो मैं अभी इनसे बात नहीं करूंगा, ” मैंने उनसे कितनी बार कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं है लेकिन फिर भी वह नही माने और अपने-अपने घर के अंदर चले गए यह कहते हुए कि यह बच्चे अपने घर से दूर पढ़ाई के लिए आए हैं इनको हमारे शहर में पढ़ने में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए…..

अब जरा अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिए अपने बिहार में किस शहर में हम लोग इस तरह का माहौल बना सकेंगे, जहां बाहर से आए बच्चों को इस तरह का माहौल मिलेगा ।

उल्टा मैंने ऐसा भी होते देखा है कि अपने यहां अगर कोई बच्चा लाउडस्पीकर वाले से जाकर यह आग्रह भी करें कि उसका एग्जाम है थोड़ा आवाज धीरे कर दे, तो लाउडस्पीकर के चलाने वाले मनचले लोग आवाज और ज्यादा बढ़ा देते हैं यह कहते हुए “बड़का पढ़नीहार बनल बा, पढ़ के इंगलैंड जाई का! “

यह बात सोचने की है! वही माहौल जो हम कोटा जैसे शहरों में ढूंढते हैं वह माहौल हम लोग अपने यहां नहीं बना पाते। कोटा स्टेशन पर पहुंचने में अगर रात का 12 भी बजा हो तो भी कोटा शहर तक जाने में यह डर नहीं होता कि कोई लूट लेगा।

अगर इन सब कमियों को हम लोग अपने समाज से दूर कर पाए तो हमारे बिहार का भी शहर तरक्की की रोशनी से भर जाएगा। जो 15 अरब रुपया हम आज किसी दूसरे शहर में दे रहे हैं वह पैसा अपने शहर में रहेगा तो हम बिहारियों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। साथ ही हमारे बच्चे अपने घर से दूर जाने की वजह से कुछ बुरी आदतों में फंस जाते हैं उन सब से भी सुरक्षा रहेगी।

आइए हम सब मिलकर यह संकल्प लें अपने बिहार को तरक्की की नई राह ले जाने में अपने तरफ से भरपूर कोशिश करेंगे।

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Imran Noor

An IITian, a Petroleum Engineer by profession and a strong believer in reforms through Education. I find myself very good at motivating youngsters to become achievers. I have been active in bringing quality standards of Education in rural areas of Bihar.

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