मुजफ्फरपुर में मौत के साए में इलाज: 950 अस्पतालों के पास नहीं है फायर एनओसी
प्रसाद हॉस्पिटल अग्निकांड ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल
मुजफ्फरपुर में हाल ही में हुए प्रसाद हॉस्पिटल अग्निकांड ने शहर की स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा इंतजामों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। इस घटना ने यह खुलासा किया है कि जिले में मरीजों की जान के साथ किस हद तक खिलवाड़ हो रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जिले में एक हजार से अधिक निजी अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित हो रहे हैं, लेकिन इनमें से महज 50 के पास ही अग्निशमन विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मौजूद है। इसका सीधा अर्थ है कि करीब 950 अस्पताल बिना किसी ठोस सुरक्षा इंतजाम के मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
सुरक्षा मानकों की अनदेखी
अग्निशमन विभाग के नियमों के अनुसार, किसी भी अस्पताल या व्यावसायिक भवन को एनओसी प्राप्त करने के लिए कड़े मानकों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें 12 फीट चौड़ी सड़क की उपलब्धता, फायर हाइड्रेंट सिस्टम, स्प्रिंकलर, अग्निशमन यंत्र और आपातकालीन निकास द्वार जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके अलावा, अस्पताल में प्रशिक्षित कर्मियों का होना भी जरूरी है ताकि किसी भी अनहोनी की स्थिति में तुरंत बचाव कार्य किया जा सके। हालांकि, शहर के अधिकांश अस्पताल तंग गलियों में स्थित हैं, जहां आपात स्थिति में दमकल की गाड़ियों का पहुंचना भी नामुमकिन है।
होटल और रेस्तरां भी खतरे की जद में
यह समस्या केवल अस्पतालों तक ही सीमित नहीं है। शहर में संचालित हो रहे सौ से अधिक होटल और रेस्तरां भी सुरक्षा के मामले में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से केवल 20 प्रतिष्ठानों ने ही फायर ऑडिट कराया है। बाकी सभी होटल बिना किसी सुरक्षा तैयारी के चल रहे हैं, जो शहरवासियों के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
सवाल यह उठता है कि बिना एनओसी के इतने बड़े पैमाने पर अस्पताल और होटल कैसे संचालित हो रहे हैं? आखिर इनकी निगरानी करने वाली एजेंसियां क्या कर रही हैं? प्रसाद हॉस्पिटल की घटना ने यह साबित कर दिया है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी का खामियाजा आम जनता को अपनी जान देकर चुकाना पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि प्रशासन इन संस्थानों पर सख्त कार्रवाई करे और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराए ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।
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