मुजफ्फरपुर: प्रभार सौंपने के बाद भी सीओ ने निपटाए दाखिल-खारिज, डिजिटल रिकॉर्ड ने खोली पोल
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
मुजफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां के पूर्व अंचलाधिकारी (सीओ) अनिल कुमार संतोषी पर आरोप है कि उन्होंने अपना पदभार आधिकारिक रूप से सौंपने के बाद भी सरकारी पोर्टल का इस्तेमाल कर दर्जनों दाखिल-खारिज के मामलों को निपटाया। यह घटना न केवल प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सरकारी डिजिटल प्रणाली की सुरक्षा पर भी बड़े सवाल खड़े करती है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, अनिल कुमार संतोषी का तबादला पूर्वी चंपारण में सहायक बंदोबस्त पदाधिकारी के रूप में हुआ था। उन्होंने 4 जुलाई की शाम 6:24 बजे विधिवत रूप से अपने पद का प्रभार दूसरे अधिकारी को सौंप दिया था। हालांकि, सरकारी पोर्टल के डिजिटल लॉग्स से पता चला है कि प्रभार सौंपने के बाद भी रात 8:50 बजे तक उनके नाम से दाखिल-खारिज की प्रक्रिया जारी रही। इस दौरान दर्जनों आवेदनों को स्वीकृत किया गया, जो सीधे तौर पर नियमों के खिलाफ है।
विवादित जमीनों पर भी लिया फैसला
स्थानीय ग्रामीणों ने इस मामले में गंभीर शिकायतें दर्ज कराई हैं। आरोप है कि सीओ ने उन विवादित मामलों में भी अपनी सहमति दे दी, जो पहले से ही न्यायालय में लंबित थे। इतना ही नहीं, राजस्व कर्मचारियों की रिपोर्ट और दूसरी पक्ष की आपत्तियों को भी पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। जमहरुआ पंचायत के मुरौल गांव से जुड़ा एक मामला विशेष रूप से चर्चा में है, जहां जमीन का रकबा कम होने के बावजूद जमाबंदी में हेरफेर कर अधिक जमीन दर्ज करने का आरोप है।
जिला प्रशासन की सख्त कार्रवाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी कुमार गौरव ने तत्काल प्रभाव से तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच कमेटी का गठन किया है। यह टीम डिजिटल लॉग्स और उन सभी फाइलों की गहन जांच कर रही है जिन्हें प्रभार सौंपने के बाद प्रोसेस किया गया था। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषी पाए जाने पर सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पूर्व सीओ का पक्ष
दूसरी ओर, पूर्व सीओ अनिल कुमार संतोषी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने जो भी कार्य किए, वे नियमों के दायरे में रहकर किए गए हैं। बहरहाल, अब सबकी निगाहें जांच कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं कि आखिर प्रभार सौंपने के बाद डिजिटल डोंगल का इस्तेमाल किसने और किस उद्देश्य से किया।
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